ना जाने क्यूँ ...

ना जाने क्यूँ आज कल ,
मैं एक छोटे से अँधेरे कमरे से बाहर टकटकी लगा ,
घंटो तकती रहती हूँ। . .
वो जो सामने पेड़ खड़ा है ना , उसके पत्ते गिरते गिनती रहती हूँ
सोचती हूँ , कि काश इन गिरते पत्तो की तरह ही होती ना ज़िंदगी ?...
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ये जिस आसानी के साथ , यूँ इस पेड़ से उखड़कर गिर जाते है
और फिर ,मिटटी मे मिल, फिर से नया रूप लेते है ,
काश की इतना ही आसान होता असल ज़िंदगी में भी उन यादों को भुलाना।
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ये जो रिश्ते-नाते है , ये जो कस्मे-वादे है , ये जो अधूरी बाते है , और बिखरे सपने हमारे है ...
ये क्यों इस तरह दिल को दुखाते है ?...
क्यों ये लोग आते जाते, हमको गलत ठहराते है ?....
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आसान नहीं होता है ,
आसान नहीं होता है !...
अपने असल भावों को सच्चाई के साथ सबके सामने रख पाना,
तुम जो महसूस करो, उसके लिए अकेले खड़े रह पाना।
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पर किसी ने यूँ तो सही ही कहा है
सच बोलना बस शुरुआत मे ही कठिन है , उसके बाद सब सरल है

सच अपनाना भी कड़वी दवा की ही तरह है...पानी के साथ जो एक बार गटक लो , तो शुरू मे कड़वी लगती है ...
पर सही वही करके जाती है।
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तो सुनो !
इन मुश्किलों के आगे झुकना मत तुम कभी!
इन्ही गिरते पत्तो की तरह तुम भी एक रोज़ , एक नया रूप लोगे।
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एक नया सवेरा , अपनी बाहें खोले तुम्हारे आगाज़ का इंतज़ार करेगा ,
मैं बस उसी दिन की आस में इस अँधेरे कमरे में ,घंटो गिरते पत्ते गिनती रहती हूँ।
-राशि

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